प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने और मरीजों को सही समय पर गुणवत्तापूर्ण दवाएं उपलब्ध कराने में फार्मासिस्टों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। लेकिन दुर्भाग्य से, राज्य में फार्मासिस्टों की सरकारी भर्ती की रफ्तार बेहद सुस्त बनी हुई है। स्टेट फार्मेसी काउंसिल के आंकड़ों और रिपोर्ट्स के अनुसार, पिछले 15 वर्षों में केवल 5,754 फार्मासिस्टों की ही स्थायी भर्ती हो सकी है, जबकि वर्तमान में राज्य के सरकारी अस्पतालों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHCs) और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHCs) में 14,000 से अधिक फार्मासिस्टों की सख्त जरूरत है।
भर्ती की इस कछुआ चाल से न केवल बेरोजगार फार्मा डिप्लोमा और डिग्री धारक युवाओं का भविष्य अंधकारमय हो रहा है, बल्कि सरकारी अस्पतालों में आने वाले गरीब और ग्रामीण मरीजों को भी सही इलाज व परामर्श मिलने में बाधा आ रही है।
15 सालों के आंकड़े: मांग और पूर्ति का बड़ा अंतर
अगर हम पिछले डेढ़ दशक के आंकड़ों पर नजर डालें, तो सरकारी प्राथमिकताओं में फार्मासिस्टों की भर्ती काफी पीछे नजर आती है। जनसंख्या में वृद्धि के साथ-साथ सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या तो बढ़ी, लेकिन वहां तैनात होने वाले फार्मासिस्टों के पद स्वीकृत होने और उन पर स्थायी भर्ती होने की प्रक्रिया ठप रही।
| विवरण | संख्या / स्थिति |
|---|---|
| कुल अनुमानित आवश्यकता | 14,000+ पद |
| 15 वर्षों में कुल भर्ती | 5,754 पद |
| वर्तमान में अनुमानित कमी | 8,200 से अधिक पद |
| प्रतिवर्ष औसतन भर्ती | लगभग 383 पद |
स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ रहा प्रतिकूल असर
अस्पतालों में फार्मासिस्ट केवल दवा बांटने का काम नहीं करते, बल्कि वे दवाओं की डोज, उनके साइड इफेक्ट्स और रखरखाव (Cold Chain Maintain करना) की भी जिम्मेदारी संभालते हैं। नियमित भर्तियों के न होने से निम्नलिखित समस्याएं पैदा हो रही हैं:
- मरीजों की सुरक्षा से खिलवाड़: फार्मासिस्टों की कमी के कारण कई स्वास्थ्य केंद्रों पर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी या अन्य अप्रशिक्षित स्टाफ दवा बांटने को मजबूर हैं, जिससे गलत दवा मिलने का खतरा बना रहता है।
- अस्पतालों में लंबी कतारें: बड़े जिला अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में दवा वितरण केंद्रों पर मरीजों की लंबी-लंबी लाइनें लग रही हैं।
- संविदा पर निर्भरता: सरकारें स्थायी भर्ती निकालने के बजाय कम वेतन पर संविदा (Contractual) आधार पर काम चला रही हैं, जिससे युवाओं को आर्थिक शोषण का सामना करना पड़ रहा है।
बेरोजगार युवाओं का बढ़ता आक्रोश
हर साल हजारों छात्र B.Pharm और D.Pharm की पढ़ाई पूरी करके निकलते हैं और स्टेट फार्मेसी काउंसिल में रजिस्ट्रेशन कराते हैं। लेकिन नियमित भर्ती के अभाव में युवाओं में भारी निराशा है। कई योग्य अभ्यर्थी अपनी आयु सीमा पार कर रहे हैं। फार्मासिस्ट यूनियनों और छात्र संगठनों का कहना है कि सरकार को जल्द से जल्द नई भर्ती का कैलेंडर जारी करना चाहिए और परीक्षा प्रक्रिया को तय समय सीमा में पूरा करना चाहिए।
प्रमुख मांगें और समाधान
स्वास्थ्य विशेषज्ञों और फार्मासिस्ट एसोसिएशनों ने सरकार के समक्ष निम्नलिखित प्रमुख सुझाव रखे हैं:
- तत्काल नई भर्ती का विज्ञापन: खाली पड़े 8,000 से अधिक पदों पर तत्काल नई भर्ती प्रक्रिया शुरू की जाए।
- वार्षिक भर्ती कैलेंडर: अन्य परीक्षाओं की तर्ज पर फार्मासिस्ट भर्ती के लिए भी एक वार्षिक कैलेंडर जारी हो।
- पैरामेडिकल बोर्ड/काउंसिल का सशक्तीकरण: स्टेट फार्मेसी काउंसिल को भर्ती प्रक्रियाओं की निगरानी और त्वरित निस्तारण के लिए अधिक अधिकार दिए जाएं।
- संविदा कर्मियों का समायोजन: वर्षों से कम वेतन पर काम कर रहे संविदा फार्मासिस्टों को बोनस अंक या प्राथमिकता देकर स्थायी किया जाए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
Q1: स्टेट फार्मेसी काउंसिल में रजिस्ट्रेशन क्यों जरूरी है?
उत्तर: किसी भी बी.फार्म या डी.फार्म उत्तीर्ण छात्र के लिए आधिकारिक रूप से फार्मासिस्ट के रूप में कार्य करने या सरकारी/निजी नौकरी पाने के लिए काउंसिल में रजिस्ट्रेशन अनिवार्य होता है।
Q2: राज्य में फार्मासिस्ट के कुल कितने पद खाली हैं?
उत्तर: अनुमानित आंकड़ों के अनुसार, 14,000 की कुल जरूरत के मुकाबले लगभग 8,000 से अधिक पद वर्तमान में रिक्त पड़े हैं।
Q3: क्या आगामी महीनों में नई फार्मासिस्ट भर्ती आने की संभावना है?
उत्तर: लगातार बढ़ते विरोध और स्वास्थ्य विभाग के दबाव के कारण सरकार जल्द ही नए पदों पर भर्ती प्रक्रिया की घोषणा कर सकती है। अभ्यर्थियों को आधिकारिक वेबसाइट पर नजर रखने की सलाह दी जाती है।