सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख: शिक्षक भर्ती में ट्रांसजेंडर्स की अनदेखी पर जताई नाराजगी
देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court of India) ने एक बार फिर ट्रांसजेंडर्स के मौलिक अधिकारों और समानता के मुद्दे पर कड़ा रुख अख्तियार किया है। शिक्षक भर्ती प्रक्रिया में ट्रांसजेंडर समुदाय के उम्मीदवारों को शामिल न किए जाने अथवा उनके लिए अलग श्रेणी व आरक्षण का प्रावधान न होने पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और संबंधित राज्य सरकारों से विस्तृत जवाब तलब किया है।
अदालत ने स्पष्ट किया है कि जब भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14, 15, 16 और 21 प्रत्येक नागरिक को समानता और गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार देता है, तो सरकारी भर्तियों से किसी वर्ग को सिर्फ उसकी लैंगिक पहचान के आधार पर बाहर कैसे रखा जा सकता है?
मामले की मुख्य पृष्ठभूमि (Background of the Case)
यह मामला उस समय तूल पकड़ा जब शिक्षक भर्ती (Teacher Recruitment) के लिए जारी किए गए आधिकारिक नोटिफिकेशन और ऑनलाइन आवेदन पोर्टल में लिंग (Gender) के कॉलम में केवल 'पुरुष' (Male) और 'महिला' (Female) का विकल्प दिया गया था। तृतीय लिंग (Transgender / Third Gender) के उम्मीदवारों के लिए न तो अलग श्रेणी उपलब्ध थी और न ही आयु सीमा या कट-ऑफ में कोई विशेष छूट।
इसके खिलाफ ट्रांसजेंडर अभ्यर्थियों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और तर्क दिया कि नालसा (NALSA) फैसले के वर्षों बीत जाने के बाद भी सरकारी भर्ती एजेंसियां नियमों का पालन नहीं कर रही हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछे ये अहम सवाल
- ऑनलाइन पोर्टल पर विकल्प क्यों नहीं? भर्ती पोर्टल पर ट्रांसजेंडर्स के लिए तीसरे विकल्प का प्रावधान क्यों नहीं किया गया?
- नालसा जजमेंट का पालन क्यों नहीं हुआ? 2014 के ऐतिहासिक NALSA फैसले के तहत मिले अधिकारों को जमीनी स्तर पर भर्ती नियमों में क्यों नहीं लागू किया गया?
- आरक्षण और आयु में छूट: क्या ट्रांसजेंडर उम्मीदवारों के लिए क्षैतिज आरक्षण (Horizontal Reservation) या पात्रता अंकों में छूट की कोई व्यवस्था बनाई गई है?
- समावेशी नीति का अभाव: शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में ट्रांसजेंडर शिक्षकों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए सरकार का रोडमैप क्या है?
ऐतिहासिक संदर्भ: NALSA जजमेंट (2014) और ट्रांसजेंडर कानून (2019)
साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने National Legal Services Authority (NALSA) v. Union of India मामले में ऐतिहासिक निर्णय देते हुए ट्रांसजेंडर्स को 'तृतीय लिंग' के रूप में मान्यता दी थी। इसके बाद संसद ने Transgender Persons (Protection of Rights) Act, 2019 पारित किया, जिसमें शिक्षा और रोजगार में किसी भी तरह के भेदभाव को गैर-कानूनी घोषित किया गया है। इसके बावजूद विभिन्न राज्य भर्ती बोर्ड आज भी विज्ञापनों में इस वर्ग की उपेक्षा करते हैं।
शिक्षक भर्ती पर इस आदेश का क्या होगा प्रभाव?
| प्रभाव का क्षेत्र | संभावित बदलाव |
|---|---|
| आवेदन पोर्टल | सभी सरकारी शिक्षक भर्तियों (CTET, REET, Super TET आदि) में 'Transgender' का स्पष्ट विकल्प अनिवार्य होगा। |
| कट-ऑफ और आयु सीमा | आरक्षित श्रेणियों की तर्ज पर आयु सीमा और न्यूनतम अहर्ता अंकों में विशेष छूट मिल सकती है। |
| भर्ती विज्ञापन | भविष्य के सभी भर्ती नोटिफिकेशन में ट्रांसजेंडर अधिकारों के संरक्षण का स्पष्ट उल्लेख करना होगा। |
| समानता का अवसर | स्कूलों में समावेशी वातावरण बनेगा और समाज में फैली भ्रांतियों में कमी आएगी। |
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q1. सुप्रीम कोर्ट ने किस आधार पर सरकार से जवाब मांगा है?
अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 16 (रोजगार में अवसर की समानता) और NALSA फैसले की अवहेलना को लेकर सरकार से स्पष्टीकरण मांगा है।
Q2. क्या अब शिक्षक भर्ती में ट्रांसजेंडर्स आवेदन कर पाएंगे?
जी हां, सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप और निर्देशों के बाद भर्ती बोर्डों को अपने ऑनलाइन फॉर्म और दिशा-निर्देशों में संशोधन कर ट्रांसजेंडर्स को शामिल करने की अनुमति देनी होगी।
Q3. क्या ट्रांसजेंडर्स को शिक्षक भर्ती में कोई आरक्षण मिलता है?
वर्तमान में कई राज्य सरकारें क्षैतिज आरक्षण (Horizontal Reservation) देने पर विचार कर रही हैं। सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले के बाद इस पर देशव्यापी नीति स्पष्ट होने की संभावना है।