भारत की राजधानी दिल्ली का जंतर-मंतर केवल एक ऐतिहासिक खगोलीय वेधशाला (Observatory) नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में असंतोष, मांगों और जन-आंदोलनों का सबसे बड़ा केंद्र रहा है। हाल के दिनों में जंतर-मंतर पर कड़े नियमों, पुलिस बैरिकेडिंग और प्रदर्शनों पर लगाई गई बंदिशों को देखकर यह सवाल उठने लगा है कि क्या लोकतंत्र की इस 'आवाज' पर ताला लगाया जा रहा है?
बोट क्लब से जंतर-मंतर तक का सफर
दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों का मुख्य ठिकाना हमेशा से जंतर-मंतर नहीं था। 1990 के दशक से पहले तक, राजधानी में शक्ति प्रदर्शन और धरने का सबसे बड़ा केंद्र इंडिया गेट के पास स्थित बोट क्लब (Boat Club) हुआ करता था।
वर्ष 1988 में किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में लाखों किसानों ने बोट क्लब को घेर लिया था, जिससे पूरी दिल्ली ठप हो गई थी। इसके बाद 1993 में सुरक्षा और यातायात व्यवस्था का हवाला देकर सरकार ने बोट क्लब पर बड़ी सभाओं और प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगा दिया। इसके बाद प्रदर्शनकारियों को संसद मार्ग से सटे जंतर-मंतर की तरफ स्थानांतरित कर दिया गया।
जंतर-मंतर पर हुए इतिहास बदलने वाले बड़े आंदोलन
पिछले तीन दशकों में जंतर-मंतर ने देश के कई बड़े सामाजिक और राजनीतिक बदलावों की नींव रखी है:
- अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन (2011): इंडिया अगेंस्ट करप्शन (IAC) के बैनर तले अन्ना हजारे के अनशन ने पूरे देश को झकझोर दिया था, जिसने आगे चलकर आम आदमी पार्टी (AAP) के उदय का रास्ता साफ किया।
- निर्भया कांड के खिलाफ जन-आक्रोश (2012): दिल्ली में हुए वीभत्स बलात्कार कांड के बाद हजारों युवा स्वतःस्फूर्त होकर जंतर-मंतर पर एकत्र हुए, जिससे कानूनों में कड़े संशोधन करने पड़े।
- वन रैंक-वन पेंशन (OROP) आंदोलन: पूर्व सैनिकों ने वर्षों तक जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण धरना देकर अपनी मांगों को केंद्र सरकार के समक्ष मजबूती से रखा।
- पहलवानों और किसानों का प्रदर्शन: हाल के वर्षों में देश के नामचीन पहलवानों द्वारा कुश्ती महासंघ के पूर्व अध्यक्ष के खिलाफ और कृषि कानूनों को लेकर किसानों का प्रदर्शन जंतर-मंतर की प्रमुख घटनाओं में शामिल है।
एनजीटी (NGT) का आदेश और कड़े नियम
अक्टूबर 2017 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने जंतर-मंतर पर होने वाले सभी प्रकार के धरना-प्रदर्शनों पर रोक लगा दी थी। कोर्ट ने माना था कि यहां होने वाले ध्वनि प्रदूषण (Sound Pollution) से आसपास रहने वाले नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन होता है। इसके बाद प्रदर्शनकारियों को रामलीला मैदान भेजने का आदेश दिया गया था।
हालांकि, बाद में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पूर्ण प्रतिबंध लोकतंत्र के सिद्धांतों के खिलाफ है। इसके बाद दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर पर सीमित संख्या (लगभग 1000 लोगों) में और पूर्व अनुमति के साथ ही प्रदर्शन करने की अनुमति दी।
जंतर-मंतर ही प्रदर्शनकारियों की पहली पसंद क्यों?
जंतर-मंतर का स्थान इसे बेहद खास बनाता है:
- संसद भवन से नजदीकी: यह स्थल संसद भवन और प्रमुख केंद्रीय मंत्रालयों के बेहद करीब है, जिससे नीति निर्माताओं तक आवाज आसानी से पहुंचती है।
- मीडिया कवरेज: दिल्ली के केंद्र में होने के कारण राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान यहां बहुत जल्दी आकर्षित होता है।
- पहुंच में आसान: कनॉट प्लेस के पास होने से देश के कोने-कोने से आने वाले लोगों के लिए यहां पहुंचना आसान रहता है।
निष्कर्ष: लोकतंत्र में प्रतीक का महत्व
जंतर-मंतर केवल एक सड़क या स्थल नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में आम जनता की आवाज का प्रतीक है। हालांकि, सुरक्षा व्यवस्था, यातायात और स्थानीय निवासियों की शांति बनाए रखना प्रशासन के लिए जरूरी है, लेकिन जनता के विरोध दर्ज कराने के अधिकार को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जंतर-मंतर पर 'ताले' या कड़े प्रतिबंधों की खबर हमेशा इस बहस को जन्म देती है कि लोकतंत्र में विरोध के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।