हाल ही में आयोजित ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन के बाद भारत की मुख्य विपक्षी पार्टी, कांग्रेस के भीतर वैश्विक कूटनीति और देश की विदेश नीति को लेकर दो अलग-अलग राय देखने को मिली हैं। जहां पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने ब्रिक्स की उपयोगिता और इसके भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं, वहीं पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व कूटनीतिज्ञ शशि थरूर ने इसे भारत के रणनीतिक और आर्थिक हितों के लिए बेहद फायदेमंद करार दिया है।
पी. चिदंबरम का रुख: ब्रिक्स की उपयोगिता पर उठाए सवाल
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने ब्रिक्स संगठन की प्रभावशीलता पर अपनी संशय व्यक्त की है। उनका तर्क है कि ब्रिक्स धीरे-धीरे अपने मूल उद्देश्यों से भटक रहा है और इसमें चीन का दबदबा बढ़ता जा रहा है।
- चीन का बढ़ता प्रभाव: चिदंबरम का मानना है कि ब्रिक्स में चीन की केंद्रीय भूमिका भारत के लिए रणनीतिक चुनौतियां पैदा कर सकती है।
- ठोस नतीजों की कमी: उन्होंने सवाल उठाया कि पिछले कुछ वर्षों में ब्रिक्स से भारत को कौन से आर्थिक या व्यापारिक लाभ मिले हैं।
- ग्लोबल साउथ का नेतृत्व: उनका मानना है कि भारत को ऐसे मंचों पर अत्यधिक निर्भर रहने के बजाय अपने द्विपक्षीय संबंधों पर अधिक ध्यान देना चाहिए।
शशि थरूर का दृष्टिकोण: बहुध्रुवीय दुनिया में BRICS का महत्व
इसके ठीक विपरीत, पूर्व विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर ने ब्रिक्स को भारत के लिए एक महत्वपूर्ण मंच बताया है। उनका कहना है कि पश्चिमी देशों के प्रभाव को संतुलित करने और बहुध्रुवीय विश्व (Multipolar World) के निर्माण में ब्रिक्स की भूमिका अहम है।
- वैश्विक मंच पर मौजूदगी: थरूर के अनुसार, भारत को किसी भी ऐसे मंच का हिस्सा बने रहना चाहिए जहां वह विकासशील देशों (Global South) की आवाज बन सके।
- चीन के साथ संवाद: उन्होंने तर्क दिया कि ब्रिक्स जैसा मंच भारत और चीन को एक साथ बैठने और बातचीत करने का अवसर प्रदान करता है, जो सीमा तनाव के बीच भी कूटनीतिक रास्ते खुले रखता है।
- न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB): थरूर ने ब्रिक्स बैंक के फायदों का जिक्र करते हुए कहा कि यह विकासशील देशों को वित्तीय सहायता प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
कांग्रेस के अंदर विरोधाभास या आंतरिक लोकतंत्र?
विदेश नीति जैसे संवेदनशील मुद्दे पर कांग्रेस के दो शीर्ष नेताओं के अलग-अलग रुख ने राजनीतिक गलियारों में चर्चा छेड़ दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मतभेद पार्टी के भीतर विदेश नीति को लेकर जारी वैचारिक मंथन को दर्शाता है। जहां एक धड़ा चीन के प्रभाव को लेकर सतर्क रहने की वकालत करता है, वहीं दूसरा धड़ा व्यावहारिक कूटनीति और वैश्विक जुड़ाव को प्राथमिकता देता है।
निष्कर्ष
ब्रिक्स पर पी. चिदंबरम और शशि थरूर के विचार यह स्पष्ट करते हैं कि वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में भारत की विदेश नीति कितनी जटिल हो चुकी है। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह चीन जैसे प्रतिद्वंद्वी के साथ एक ही मंच पर रहते हुए अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा कैसे करे और वैश्विक दक्षिण की आवाज कैसे बने।