इसराइल में हुए हालिया आम चुनावों के शुरुआती नतीजों और एग्जिट पोल के आंकड़ों ने एक बार फिर देश की राजनीति में अनिश्चितता की स्थिति पैदा कर दी है। पूर्व प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू (Benjamin Netanyahu) का दक्षिणपंथी गठबंधन सबसे बड़े गुट के रूप में उभरता हुआ दिख रहा है, लेकिन वह स्पष्ट बहुमत के जादुई आंकड़े से थोड़ा दूर नजर आ रहा है।
इसराइली संसद 'नेसेट' (Knesset) की 120 सीटों वाले सदन में सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सीटों के बहुमत की आवश्यकता होती है। मौजूदा नतीजों और रुझानों से स्पष्ट हो रहा है कि इसराइल में राजनीतिक स्थिरता अभी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
चुनाव के अब तक आए नतीजों की स्थिति
ताजा आंकड़ों के मुताबिक, बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी (Likud Party) और उनके सहयोगी दलों को बढ़त तो हासिल हुई है, लेकिन बहुमत का स्पष्ट आंकड़ा पाना अभी भी पहेली बना हुआ है। दूसरी तरफ, निवर्तमान प्रधानमंत्री याइर लपिड का गठबंधन भी कड़ा मुकाबला दे रहा है।
- नेतन्याहू गठबंधन: रुझानों में 59-60 सीटों के आसपास सिमटता दिख रहा है, जो बहुमत (61) से महज 1-2 सीट दूर है।
- विरोधी गठबंधन: वर्तमान सत्ताधारी गठबंधन को लगभग 54-55 सीटें मिलती दिख रही हैं।
- अन्य व अरब पार्टियां: बाकी बची सीटों पर अन्य छोटे दल और अरब गठबंधन के प्रत्याशी बढ़त बनाए हुए हैं।
इन नतीजों से क्या बड़े संकेत मिल रहे हैं?
इसराइल में पिछले चार-पांच सालों में यह पांचवां आम चुनाव है। बार-बार चुनाव होने के बावजूद जनता का जनादेश किसी एक पक्ष में स्पष्ट रूप से नहीं आ रहा है। आइए जानते हैं कि इन नतीजों से क्या प्रमुख संकेत मिल रहे हैं:
1. गहराई से बंटी हुई जनता (Political Polarization)
ये परिणाम दर्शाते हैं कि इसराइल का समाज और मतदाता दो स्पष्ट धड़ों में बंटे हुए हैं—एक धड़ा नेतन्याहू का समर्थन करता है, जबकि दूसरा धड़ा उनके विरोध में खड़ा है। नेतन्याहू पर चल रहे भ्रष्टाचार के मामलों के बावजूद उनका आधार (Base) मजबूत बना हुआ है।
2. छोटे और कट्टरपंथी दलों की बढ़ी 'किंगमेकर' भूमिका
बहुमत से दूर रहने की स्थिति में अब अति-दक्षिणपंथी और धार्मिक दल निर्णायक भूमिका में आ गए हैं। नेतन्याहू को सरकार बनाने के लिए 'रिलिजियस ज़ियोनिज़्म' जैसे अति-राष्ट्रवादी गुटों की सभी शर्तों को मानना पड़ सकता है, जिससे भावी सरकार की नीतियां काफी आक्रामक हो सकती हैं।
3. राजनीतिक अस्थिरता का खतरा बरकरार
यदि नेतन्याहू 61 या 62 सीटों के साथ किसी तरह सरकार बना भी लेते हैं, तो वह बेहद कमजोर बहुमत की सरकार होगी। ऐसी सरकार में किसी भी एक छोटे दल की नाराजगी पूरी सरकार को गिरा सकती है, जिससे एक बार फिर चुनाव की नौबत आ सकती है।
नेतन्याहू के सामने अब क्या रास्ते हैं?
अब सारा दारोमदार इस बात पर है कि अंतिम मतगणना के बाद अंतिम आंकड़े क्या रहते हैं:
यदि नेतन्याहू 61 का आंकड़ा पार कर लेते हैं, तो वह देश के इतिहास में सबसे दक्षिणपंथी सरकार का नेतृत्व करेंगे। हालांकि, अगर वह 60 सीटों पर अटक जाते हैं, तो उन्हें विपक्षी खेमे के किसी दल को तोड़ना होगा या फिर देश में छठवें चुनाव की आहट तेज हो जाएगी।
भारत और वैश्विक राजनीति पर प्रभाव
भारत और इसराइल के संबंध लंबे समय से काफी मजबूत रहे हैं। बेंजामिन नेतन्याहू और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच बेहतरीन व्यक्तिगत संबंध माने जाते हैं। यदि नेतन्याहू सत्ता में वापसी करते हैं, तो भारत-इसराइल रक्षा और रणनीतिक साझेदारी को और गति मिलने की उम्मीद है। वहीं, मध्य पूर्व (Middle East) में शांति और अरब देशों के साथ संबंधों के मामले में नेतन्याहू का रुख काफी कड़ा रहने की संभावना है।
निष्कर्ष: इसराइल के चुनाव परिणामों ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि देश में सत्ता का रास्ता बेहद पेचीदा है। हालांकि नेतन्याहू रेस में सबसे आगे हैं, लेकिन असली परीक्षा सरकार बनाने और उसे स्थिर चला पाने की होगी।