हाल ही में आयोजित ब्रिक्स (BRICS) समिट में दुनिया भर के कई प्रमुख और शक्तिशाली नेताओं का जमावड़ा देखने को मिला। रूस, चीन और भारत जैसे बड़े देशों की उपस्थिति ने इस सम्मेलन को वैश्विक राजनीति का मुख्य केंद्र बना दिया। लेकिन, चमक-धमक और द्विपक्षीय मुलाकातों के इस दौर के बीच एक बड़ा सवाल यह उठता है कि इस सम्मेलन से भारत को क्या हासिल हुआ और भारत के लिए कौन से महत्वपूर्ण कूटनीतिक मुद्दे दांव पर लगे हैं?
1. ब्रिक्स का विस्तार और चीन का बढ़ता प्रभाव
ब्रिक्स समूह में नए सदस्यों को शामिल करने के बाद से यह संगठन और अधिक विविधतापूर्ण हो गया है। हालांकि, इस विस्तार के साथ ही संगठन के भीतर चीन का प्रभाव बढ़ने की चिंताएँ भी गहरा रही हैं। भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि ब्रिक्स एंटी-वेस्टर्न (पश्चिमी देशों के खिलाफ) गुट न बने, बल्कि यह एक निष्पक्ष और समावेशी आर्थिक मंच के रूप में काम करे।
2. भारत के लिए कौन सी चीज़ें दांव पर हैं?
वैश्विक पटल पर अपनी स्थिति मजबूत करने के साथ-साथ भारत को कई मोर्चों पर बेहद सतर्क रहने की आवश्यकता है:
- पश्चिम और पूर्व के बीच संतुलन: भारत के संबंध अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ भी काफी मजबूत हैं। ब्रिक्स में रूस और चीन की आक्रामक भूमिका के बीच भारत को अपने पश्चिमी सहयोगियों और ब्रिक्स भागीदारों के बीच एक नाजुक संतुलन बनाए रखना होगा।
- डी-डॉलरलाइजेशन (De-dollarization) का मुद्दा: ब्रिक्स सदस्य अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देने की बात कर रहे हैं। भारत के लिए अपनी राष्ट्रीय मुद्रा 'रुपये' को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूती देना महत्वपूर्ण है, लेकिन ऐसा करते हुए वैश्विक वित्तीय बाजार में अपनी साख बचाना भी जरूरी है।
- सीमा विवाद और द्विपक्षीय रिश्ते: चीन के साथ सीमा पर जारी तनाव के बीच चीनी राष्ट्रपति से संवाद कायम रखना और साथ ही राष्ट्रीय सुरक्षा के हितों से कोई समझौता न करना भारत के लिए सबसे कठिन कूटनीतिक परीक्षा है।
3. आर्थिक और रणनीतिक अवसर
चुनौतियों के बावजूद, ब्रिक्स भारत को ग्लोबल साउथ (विकासशील और उभरते देशों) का प्रमुख नेता बनने का एक बेहतरीन मंच प्रदान करता है। भारत अपनी बढ़ती आर्थिक क्षमता और डिजिटल तकनीक के जरिए नए सदस्य देशों को अपनी ओर आकर्षित कर सकता है, जिससे चीन के प्रभुत्व को संतुलित करने में मदद मिलेगी।
निष्कर्ष
ब्रिक्स सम्मेलन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि दुनिया का भू-राजनीतिक परिदृश्य तेज़ी से बदल रहा है। बड़े नेताओं की मौजूदगी के बावजूद, भारत के लिए यह समय बेहद सावधानीपूर्वक कदम उठाने का है। भारत को अपने राष्ट्रीय हितों, रणनीतिक स्वायत्तता और आर्थिक विकास को प्राथमिकता देते हुए इस वैश्विक मंच का उपयोग करना होगा ताकि वह दुनिया में एक संतुलित और शांतिप्रिय महाशक्ति के रूप में अपनी स्थिति और मजबूत कर सके।