हाल ही में आयोजित ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वैश्विक राजनीति का केंद्र अब केवल पश्चिमी देश नहीं रहे। रूस के कजान में जुटे दुनिया के शीर्ष नेताओं, जिनमें भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग शामिल हैं, ने इस मंच से अपनी ताकत का अहसास कराया। हालांकि, बाहर से भले ही यह सम्मेलन एक बड़ी कूटनीतिक सफलता नजर आ रहा हो, लेकिन भारत के दृष्टिकोण से देखा जाए तो कई महत्वपूर्ण रणनीतिक और आर्थिक चीजें दांव पर लगी हैं।
1. 'एंटी-वेस्ट' बनाम 'नॉन-वेस्ट' की पतली रेखा
भारत के लिए इस सम्मेलन में सबसे बड़ी चुनौती यह संतुलन बनाए रखना है कि BRICS को 'पश्चिम विरोधी' (Anti-Western) ब्लॉक न बनने दिया जाए। रूस और चीन इस मंच का इस्तेमाल अमेरिका और उसके सहयोगियों को चुनौती देने के लिए करना चाहते हैं। वहीं, भारत का रुख हमेशा से 'गैर-पश्चिमी' (Non-Western) का रहा है। भारत अमेरिका, यूरोपीय संघ और पश्चिमी देशों के साथ अपने मजबूत रणनीतिक और व्यापारिक संबंधों को जोखिम में डाले बिना ग्लोबल साउथ की आवाज बनना चाहता है।
2. चीन के बढ़ते प्रभाव को नियंत्रित करना
BRICS संगठन का विस्तार हो चुका है और मिस्र, इथियोपिया, ईरान तथा यूएई जैसे नए देश इसमें शामिल हो चुके हैं। भारत के लिए चिंता की बात यह है कि चीन इस विस्तार का उपयोग संगठन में अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए कर सकता है। भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि नए सदस्यों के आने से संगठन का एजेंडा चीन की नीतियों के अनुकूल न झुक जाए, बल्कि भारत के हित भी सुरक्षित रहें।
3. डी-डॉलराइजेशन और मुद्रा का सवाल
सम्मेलन में अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने यानी 'डी-डॉलराइजेशन' (De-dollarization) पर काफी चर्चा हुई। रूस और चीन अपनी मुद्राओं और स्थानीय व्यापार को बढ़ावा देने के पक्ष में हैं। लेकिन भारत के लिए स्थिति अलग है। भारत अपनी मुद्रा 'रुपये' के अंतर्राष्ट्रीयकरण का समर्थन करता है, लेकिन वह किसी भी ऐसी व्यवस्था के खिलाफ है जो चीनी युआन को मजबूती दे या भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अस्थिरता पैदा करे।
भारत के लिए क्या हैं मुख्य चुनौतियां?
कूटनीतिक और आर्थिक मोर्चे पर भारत की नजरें इन बिंदुओं पर हैं:
- सीमा विवाद और द्विपक्षीय संबंध: भारत और चीन के बीच सीमा तनाव कम करने के संकेतों के बावजूद भरोसा अभी भी एक बड़ा मुद्दा है।
- ग्लोबल साउथ की कमान: भारत खुद को विकासशील देशों की असली आवाज के रूप में स्थापित करना चाहता है, जिसमें चीन से कड़ी चुनौती मिल रही है।
- आर्थिक संतुलन: पश्चिमी प्रतिबंधों से घिरे रूस के साथ ऊर्जा व्यापार बनाए रखना और साथ ही पश्चिमी देशों के साथ सेमीकंडक्टर और रक्षा सौदों को सुरक्षित रखना।
निष्कर्ष: भारत का कूटनीतिक टेस्ट
BRICS समिट में बड़े नेताओं की मौजूदगी से यह साफ है कि बहुध्रुवीय (Multipolar) दुनिया का दौर शुरू हो चुका है। लेकिन भारत के लिए यह मंच केवल तस्वीरें खिंचवाने का नहीं, बल्कि अपनी रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) को बचाने का है। आने वाले समय में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि भारत अपने पश्चिमी सहयोगियों और BRICS साझेदारों के बीच संतुलन कैसे साधता है।